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Pregnancy Tips in Hindi गर्भकाल के सभी रोग

गर्भकाल के सभी रोग


How To Get Pregnant in Hindi


जब महिला गर्भावस्था में होती है तो ऐसे समय पर जरा सी भी असावधानी या लापरवाही से कई रोग उत्पन्न हो सकते हैं जैसे-


गर्भधारण करने का सही तरीका How to get pregnant in Hindi?


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1. रक्त स्राव

कभी-कभी गर्भावस्था के दौरान किसी-किसी महिला को रक्तस्राव होता रहता है । जिसके लिए अधिक चिंता करने की आवश्यकता नहीं है । यह रोग थोड़ी सी सावधानी तथा पीछे लिखे अनुसार उपचार करने से तुरन्त दूर हो जाता है । लेकिन जब तक रक्तस्राव हो तब तक नीले रंग का सूर्य तप्त नीला पानी तीन भाग और सूर्य तप्त पीली बोतल का पानी एक भाग मिलाकर चार-चार घंटे के अंतराल से पिलाना चाहिए तथा हरी बोतल के सूर्य तप्त पानी में रूई के फाहे को भिगोकर योनि में रखना चाहिए । इसके अलावा सूर्य की नीली किरणें नीले रंग के सैलोफीन कागज या कांच से मुंह और गर्दन पर डालनी चाहिए । इससे रोग में तुरन्त लाभ मिलेगा और रक्तस्राव बंद हो जायेगा ।

2. छाती या पंसली में दर्द

कभी-कभी गर्भावस्था में किसी महिला की छाती या उसके निचले हिस्से में दर्द हो जाता है । सांस लेने में तकलीफ होती है और करवट बदलने में भी परेशानी का सामना करना पड़ता है ।

उपचार: इस रोग में संतुलित और सादा भोजन ग्रहण करना चाहिए तथा दर्द वाली जगह पर दिन में दो बार गीली मिट्टी की पट्टी लगानी चाहिए और दर्द वाली जगह को हल्का सूर्य स्नान भी कराना चाहिए । इस रोग में मेहन स्नान तथा कटि स्नान भी लाभदायक होता है । उसके बाद सूर्य किरण व रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार सूर्य तप्त पीली बोतल का जल तीन चौथाई तथा गहरी नीली बोतल का नीला पानी एक चौथाई मिलाकर दिन में चार बार पीना चाहिए । साथ ही सूर्य तप्त पीले रंग का पानी व सूर्य तप्त हरे रंग का पानी बराबर मात्रा में मिलाकर हल्का गरम करके दर्द वाली जगह को सेंकना चाहिए । इस उपचार को नियमित करने से कुछ ही दिन में रोग का निवारण हो जायेगा ।

3. कब्ज

सभी रोगों का जन्मदाता मूल रूप से कब्ज ही होता है । जो बड़ा ही दु:खदायी होता है । यह गर्भावस्था में इतना कष्टकारक होता है कि जिन महिलाओं ने इस रोग को भुगता है वही बता सकती हैं । इसकी उत्पत्ति का मूल कारण आलस्य तथा बैठे-बैठे कुछ न कुछ गलत आहार करते रहना है ।

उपचार: कब्ज को दूर करने के लिए सबेरे बिस्तर को छोड़ते ही प्यास के मुताबिक सूर्य तप्त हरा पानी पीयें तथा पांच-दस मिनट टहलने के बाद आपको शौच का तीव्र वेग आयेगा व पेट में जितना भी गंदा मल है वह साफ हो जायेगा । इसके अलावा एक-दो दिन उपवास रखना तथा हल्का-फुल्का टहलना भी आवश्यक है । कुछ दिन फलों के रस जूस पर ही निर्भर रहना चाहिए । इस रोग में कटि स्नान भी लाभदायक होता है । ध्यान रहे कि इस अवस्था में किसी प्रकार की रासायनिक दवाईयां या जुलाब लेना हानिकारक हो सकता है तथा गर्भपात होने का खतरा बना रहता है ।

4. दस्त



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गर्भावस्था में कभी-कभी हल्के-पतले दस्त भी हो जाते हैं । इससे गर्भिणी कमजोर हो जाती है तथा पतले दस्तों के कारण कभी-कभी गर्भस्राव भी हो जाता है । इसका मुख्य कारण पाचन शक्ति की कमजोरी है । अतः जब तक पेट ठीक न हो भोजन नहीं करना चाहिए । केवल ठंडे पानी पर ही निर्भर रहना उत्तम होता है । यदि ठंडे पानी में कागजी नींबू का रस निचोड़कर पीया जाए तो इस रोग में अधिक आराम आ जाता है ।

उपचार: इस रोग में मेहन स्नान करना अति उत्तम होता है तथा रोज सबेरे पेडू पर नीले पानी में रूई को भिगोकर पट्टी बांधकर रखें । इसके अलावा सूर्य किरण व रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार सूर्य तप्त पानी का टॉनिक लेते रहना चाहिए । इससे रोग में तुरन्त आराम आ जाता है ।

5. उल्टी

यह शिकायत लगभग गर्भावस्था की सभी महिलाओं में होती है तथा शुरू के चार-पांच महीनों में अधिक होती है ।

उपचार: इस रोग में सबेरे बिस्तर छोड़ते ही सूर्य किरण व रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार सूर्य तप्त हरे पानी को प्यास के अनुसार पीना चाहिए तथा दिन में भी हर भोजन से पहले सौ से दो सौ ग्राम की मात्रा तक पीयें । भोजन के दस-पन्द्रह मिनट बाद सूर्य तप्त नारंगी पानी सौ से दो सौ ग्राम की मात्रा तक लेने से भोजन जल्दी पच जाता है । मलाशय में इकट्ठा हुआ सारा दूषित मल बाहर निकल जाता है । इसके अलावा भी सबेरे उठते ही गरम पानी में नींबू निचोड़कर और उसमें थोड़ा सा सेंधा नमक मिलाकर पीने से भी इस रोग में आराम आ जाता है ।

6. मूत्र रोग

गर्भावस्था में प्राय: महिलाओं को मूत्र रोग की आम शिकायत होती है । इस रोग में कभी पेशाब का कभी अपने आप निकल जाना या पेशाब का रुक जाना या पेशाब का गाढ़ा आना आदि कई तरह के लक्षण होते हैं । इस रोग में गर्भिणी कभी हाथ और पैरों में थकावट अनुभव करती है । मन खिन्न तथा आलसी हो जाता है । कभी-कभी तो इस रोग की अधिकता में गर्भपात होने का भी भय बना रहता है ।

उपचार : इस रोग में उपचार के लिए सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार सूर्य तप्त नीला पानी पचास मास से सौ गम की मात्रा तक लेना चाहिए । ताकि पेशाब में किसी प्रकार की कोई रुकावट न रहे । इसके अलावा गरम पानी से ही स्नान करें । सुबह तथा शाम को मेहन स्नान करने से भी लाभ मिलता है। इसके अलावा सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार सूर्य चार्ज तिलों के लाल तेल की पेडू पर मालिश करें । तथा सूर्य चार्ज नारंगी शहद दिन में तीन समय एक-एक चम्मच लें । इससे यह रोग तुरन्त ठीक हो जाता है ।

7. खांसी

गर्भावस्था में महिलाओं को कभी-कभी खांसी की शिकायत भी हो जाती है । उसके लिए कब्ज को दूर करना चाहिए तथा उपचार पीछे लिखे कब्ज रोग में दिये गये अनुसार ही करें ।

इसके अलावा भी महिलाओं को गर्भावस्था के दौरान और कई तरह के अन्य रोग भी हो जाते हैं जैसे मुंह में अधिक लार आना नींद न आना सिर दर्द बेहोशी प्रदर पेट पीड़ा हृदय की धड़कन बढ़ जाना हाथ-पैरों में ऐंठन तथा योनि द्वार में खुजली आदि कई तरह के रोग जन्म लेते हैं । इसलिए गर्भावस्था वाली महिला को अपने स्वास्थ्य को हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से तैयार सूर्य तप्त तथा सूर्य चार्ज औषधियों का ही सेवन करना चाहिए ताकि किसी बाहरी दवाईयों के दुष्प्रभाव से बचा जा सके ।

अक्सर मासिक धर्म के दौरान बहुत से रोग होते हैं जिनमें मुख्यत: दो रोगों के कारण, लक्षण और उपाय प्रस्तुत हैं।

माहवारी कम होना

किसी भी महिला का प्रकृति के अनुसार साधारण तौर पर जितना माहवारी स्राव होना चाहिए उतना न होकर उससे कम होता है । इसे माहवारी कम होना कहते हैं तथा यह माहवारी कम होने का रोग कहलाता है । इस रोग के परिणाम इस प्रकार होते हैं- गर्भाशय रोग, क्षय रोग तथा मानसिक तनाव आदि इस रोग के लक्षण होते हैं । इस रोग में भोजन बन्द कर देना चाहिए । पहले तीन दिन तक रसाहार पर ही रहना चाहिए । फिर तीन-चार दिनों तक ताजे व मीठे फल तथा दूध पर रहकर दिन में कम से कम दो समय अनिमा लेकर पेट साफ कर लेना चाहिए ।

उपचार: सूर्य किरण और रंग चिकित्सा के माध्यम से लाल रंग की बोतल से तिलों का सूर्य चार्ज लाल तेल पेडू पर दिन में दो समय रात को सोने के समय तथा दिन में आराम करने के समय मालिश करें । यथासंभव सेक दें । ऐसा करने से माहवारी ठीक होने में लाभ मिलता है ।

माहवारी बन्द होने के बाद के कष्ट

चालीस-पैंतालीस वर्ष की अवस्था पार कर चुकने के बाद जब माहवारी सदा के लिए बन्द हो जाती हैं तब कुछ रोगी महिलाओं की अवस्था बहुत संकटपूर्ण हो जाती हैं ।

कारण: चक्कर आना, दोनों छातियों में दर्द, जोड़ों का दर्द होना, पाचन शक्ति का बिगड़ जाना, कब्ज आम रहना, शरीर की चर्बी का बढ़ जाना, पागलपन आदि इसके अलावा और कितने ही शारीरिक तथा मानसिक विकार सताने लगते है सिर्फ इसलिए कि ऐसी स्त्रियों का स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ होता है ।

मासिक धर्म सदा के लिए बन्द हो जाने के बाद किसी प्रकार का कष्ट हो जाने पर नीचे दिए गया उपचार करने से अवश्य ही लाभ होता है ।

उपचार: प्रतिदिन गहरी श्वास लेने की प्रक्रिया करनी चाहिए । प्रातःकाल सूर्योदय के समय दूर तक या लम्बी दूरी तक टहलना चाहिए । यथासंभव भोजन में हरी साग-भाजियों का अधिक सेवन करना चाहिए और ताजे मीठे फल-दूध या इसके साथ इसी किताब में पेज नं. 55 पर दिया हुआ समस्त रोगों के टॉनिक का सेवन करना चाहिए । चोकर युक्त आटा, छिलकेदार दाल, बिना पालिश के चावल, कटि स्नान तथा मेहन स्नान करने चाहिए । पेडू पर सूर्य तप्त हरे पानी से भिगा फाहा दिन में दो-तीन समय योनि द्वार के भीतर और बाहर रखें । इस रोग में सूर्य स्नान कम से कम तीन चार बार करना चाहिए तथा कब्ज नहीं होने देना चाहिए । कब्ज होने पर उपवास या रसाहार पर रहकर अनिमा द्वारा पेट साफ करना चाहिए । ऊपर लिखे अनुसार उपचार करने पर इस रोग में अति उत्तम होता हैं ।

जीने के लिए पानी

पानी ही जीवन है । यदि पानी न मिले तो जीवन की कल्पना हो ही नहीं सकती । हमारे शरीर में पानी एकमात्र महत्त्वपूर्ण पदार्थ है । क्योंकि आधे से अधिक वजन तक हमारे शरीर में पानी ही है । इसका अधिक भाग कोषाणुओं में होता है । यह शरीर के ऊतकों के बीच का रिक्त स्थान भर देता है और हमारे शरीर की संरचना डील-डौल को व्यवस्थित रखता है ।

सारा पानी कहां चला जाता है क्या आप जानते हैं? आपके शरीर का पानी पसीने के रूप में वाष्पीकरण द्वारा और शरीर की दूसरी प्रक्रियाओं द्वारा अवशोषित हो जाता है । देखा जाये तो आपके शरीर का ढाई क्वाटर्स पानी 24 घंटों के दौरान नष्ट हो जाता है ।

संभवत: 92 प्रतिशत पानी की आपूर्ति आपके शरीर की आंतरिक प्रक्रिया द्वारा हो जाती है । 38 प्रतिशत भोजन द्वारा पुनः प्राप्त हो जाती है जो आपकी जिम्मेदारी है । आप पानी को कई तरीकों से पी सकते हैं । फलों के रस में, शरबतों में, दूध में, चाय या कॉफी में पानी प्रचुर मात्रा में होता है ।

पानी नींद लाने के लिए

क्या आपको नींद नहीं आती? बत्ती बुझाने के बाद भी क्या आपका मस्तिष्क सोच विचारों से इतना उत्तेजित हो जाता है कि नींद नहीं आती? इस समस्या को दूर करने के लिए कुनकुने पानी से 15-20 मिनट तक स्नान कीजिए। ऐसा करने से मस्तिष्क में एकत्रित हुआ रक्त धीरे- धीरे फैलना शुरू हो जाता है और तन्त्रिकाएं शान्त हो जाती है।

यदि आप चाहें तो गुसलखाने में मोमबती जलाकर तथा कोई संगीत की धुन धीरे स्वर में रखकर स्नान के साथ-साथ सुनें। जब आपका स्नान हो जाए तो शरीर को जल्दी-जल्दी पोंछकर बिस्तर में चादर ओढ़कर सो जायें । इससे गहरी नींद आ जायेगी ।

सिर दर्द में पानी से राहत

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तीव्र सिर दर्द के कारण आप औषधी की आलमारी के पास जाने की अपेक्षा पानी के प्राकृतिक उपचार के बारे में न भूलें । गरम पानी की एक चिलमची या बाल्टी में अपने पैरों को डालें और निकालें ऐसा कई बार करने से सिर का दर्द गायब हो जाएगा ।

एक और तरीका बहुत ही साधारण और सरल है । एक चिलमची या बाल्टी में इतना गरम पानी भरें कि आपके टखने पानी में सरलता से डूब जायें । दस से पन्द्रह मिनट तक पैर पानी में रखने से सिर दर्द समाप्त हो जाता है ।

बहुत से लोग ऐसे हैं जिनकी प्यास संसार का कोई भी जल शमन (समाप्त) नहीं कर सकता । वे मन की शान्ति के प्यासे हैं । जिसे पवित्र शास्त्र ‘ जीवन जल ‘ कहते हैं । उन्हें इसकी प्यास लगी है ।

पानी यौवन को बरकरार रखता है

हर क्रिया के लिए कुछ नियम व उसके तौर तरीके होते हैं । जिनको अपनाकर उस क्रिया का लाभ उठाया जा सकता है जल पीने के भी कुछ नियम होते हैं । जिन्हें जानकर और अपनाकर स्वास्थ्य को निरोग व चेहरे को सुन्दर बनाये रखा जा सकता है । यौवन की ताजगी को बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है कि जल पीने के तौर तरीकों को जाना जाये और उन पर अमल किया जाये ।



  1. सूर्योदय से पहले उठकर नियमित रूप से पानी पीने से कई जटिल बीमारियां दूर होती हैं । क्योंकि इससे खुलकर शौच आता है और कब्ज की शिकायत दूर होती है । आयुर्वेद के नियमों के अनुसार सुबह उठकर कुल्ला करने के बाद सबसे पहले कम से कम एक गिलास पानी जरूर पीना चाहिए भले ही प्यास न लगी हो ।

  2. रात को सोने से पहले जल पीने से अच्छी नींद आती है, सोने से पहले अर्थात् बिस्तर पर जाने से पहले एक गिलास जल में एक नींबू का रस निचोड़कर पीने से अनिद्रा की बीमारी दूर होती है और अच्छी नींद आती है ।

  3. बहुत अधिक पानी नहीं पीना चाहिए और कम पानी भी नहीं पीना चाहिए क्योंकि इससे भोजन नहीं पचता । जठराग्नि को बढ़ाने अर्थात् पाचन शक्ति को बढ़ाने के लिए भोजन के साथ घूंट-घूंट करके एक गिलास पानी पीना ही पर्याप्त होता है । भोजन करते समय अधिक जल पीने से पाचनशक्ति कमजोर होती है और पेट में दर्द भी पैदा हो सकता है ।

  4. प्यास लगने पर अधिक से अधिक एक गिलास पानी ही एक बार में पीना चाहिए इससे शरीर में पानी की कमी नहीं हो पाती । कम पानी पीने पर निर्जलीकरण होता है शरीर में निर्जलीकरण से हैजा अर्थात् कै, दस्त, डायरिया आदि का प्रकोप भी हो सकता है । जबकि इन बीमारियों में भी शरीर का जल अधिक निकल जाता है और जान पर आ सकती है ।

  5. दिन भर में कम से कम आठ गिलास पानी पीना हितकर होता है । इससे शरीर के भीतर दूषित द्रव्य तरल होकर मल-मूत्र पसीने अथवा श्वास मार्ग से बाहर चले जाते हैं उपवास के दिनों में अधिक जल न पीकर थोड़ा-थोड़ा जल पीना तथा ऐनीमा लेना हितकर होता है ।

  6. जुकाम, खांसी, पथरी, पीलिया, कब्ज, मोटापा, ब्लडप्रेशर और मूत्र संबंधी संक्रामक रोग, निमोनिया, कुकर, खांसी, श्वेत प्रदर के रोगियों को दिनभर में 10 - 15 गिलास तक जल पीना चाहिए ।

  7. भोजन से ठीक पहले पानी नहीं पीना चाहिए, चाय, कॉफी आदि गर्म पेयों के पीने से पहले एक गिलास जल अवश्य पी लेना चाहिए ।

  8. दिन में दो तीन घन्टे के अंतराल पर जल अवश्य पीना चाहिए । क्योंकि इससे अन्तःस्रावी ग्रंथियों का स्राव पर्याप्त मात्रा में निकलता रहता है और यही स्राव शरीर को स्वस्थ रखने के लिए सहायक होता है । लू तथा गर्मी लग जाने पर गुनगुना जल पीना चाहिए । इससे शरीर को राहत मिलती है ।

  9. हाथ पैरों से दाह निकलने पर सिर के बहुत तपने पर तापमान बहुत ऊंचा होने पर तांबे या कांसे के चौड़े बर्तन में जल भरकर रोगी की नाभि पर डालने से (बर्फ भी रखी जा सकती है) तापमान का दाह दूर होता है ।

  10. एसिडिटी (अम्लता) की बीमारी में अधिक पानी पीने से पेट तथा पाचन नली के अन्दर की कोमल सतह जल से बचती है । एसिडिटी की अवस्था में जल को गर्म करके (उबालकर) किसी सुराही में डाल दीजिए, जब पानी ठंडा हो जाये तो उसे पीजिए । यह उच्च अम्लता की जांची और परखी हुई औषधि है ।

  11. उपवास के समय पाचन अंगों को भोजन पचाने का काम नहीं करना पड़ता यह शरीर के लिए हानिकारक होता है, अतः उपवास के समय जल में नींबू के रस को डालकर एक-एक घंटे पर जल पीना चाहिए । जिससे पाचन अंग पचाने में लगे रहेंगे तथा शरीर में जमा जहर भी बाहर निकल जायेगा । उपवास के दौरान कम जल पीने वाली महिलाओं को श्वेत प्रदर और सैक्स में कमी का होना पाया जाता है ।

  12. गर्मी की अपेक्षा सर्दियों में अधिक पानी पीना चाहिए । आर्युर्वेद शास्त्र के अनुसार जाड़े में अधिक पानी पीना दूध के समान काम करता है और शरीर हृष्ट-पुष्ट बनता है ।

  13. गुस्सा, भय, मूर्छा, शोक व चोट लग जाने पर तुरन्त एक गिलास जल पी लेना चाहिए । इससे शरीर की अन्त स्रावी अस्थियों द्वारा छोड़ी गयी हानिकारक हार्मोन्स का दुष्प्रभाव कम हो जाता है । डायरिया कालरा व उल्टी, दस्त की अन्य बीमारियों के समय उबालकर ठंडा किया हुआ जल पीना चाहिए । फ्रिज के ठंडे पानी की अपेक्षा सुराही का पानी या हैन्ड पम्प का ताजा जल पीना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है ।

स्नान की विधियां इस प्रकार है

कटि स्नान: महिला रोगों में लाभ के लिए कटि स्नान अति आवश्यक होता है । कटि स्नान के लिए एक विशेष प्रकार का कुर्सी की तरह टब लेकर उसमें पानी भरें तथा उसमें रोगी को बिठा दें । रोगी को अपने पैर टब से बाहर लकड़ी के किसी गुटके या फट्टे के ऊपर रखने चाहिए । टब के पानी में कमर तथा जांघों तक के बीच का भाग डुबोकर रखना चाहिए और इस दौरान किसी मुलायम तौलिये से नाभि, पेडू, नितम्ब तथा जांघों को पानी के अन्दर ही रगड़ते हुए मालिश करनी चाहिए ।

रोगी यदि अधिक कमजोर हो तो रोगी के पैरों को किसी बर्तन में गर्म पानी रखकर डुबो दें तथा गर्दन तक कम्बल या किसी गरम कपड़े से ढक दें । ठंडे पानी का तापमान पचास डिग्री से अस्सी डिग्री सैल्सियस तक रखना चाहिए तथा टब में उतना ही पानी रखें कि रोगी के बैठने पर पानी नाभि तक आ जाए । कटि स्नान से पहले शरीर का कोई अन्य अंग नहीं भीगना चाहिए । कटि स्नान तथा साधारण स्नान के बीच में एक घन्टे का अन्तर होना चाहिए । पानी का तापमान कम करने के लिए धीरे- धीरे पानी में रोगी की सहनशक्ति के अनुसार बर्फ के टुकड़े डाल दें । क्योंकि पानी जितना ठंडा होगा कटि स्नान स्वास्थ्य के लिए उतना ही उत्तम होगा । कटि स्नान का समय रोगी के अनुसार तीन मिनट से लेकर बीस मिनट का होना चाहिए । कटि स्नान के बाद सूखे तौलिये से शरीर रगड़कर साफ कर लेना चाहिए ।

सावधानी : तेज कमर दर्द, निमोनिया, खांसी, अस्थमा, सायटिका, गर्भाशय, मूत्राशय, जननेन्द्रिय तथा आंत की सूजन में नहीं करना चाहिए ।

मेहन स्नान: यह स्नान जननेन्द्रिय प्रक्षालन के लिए लाभप्रद है । मेहन स्नान करने के लिए बैठने के लिए ऐसा स्टूल हो जो आगे की ओर से अर्द्ध चन्द्राकार में कटा हो ताकि उस पर बैठकर जननैन्द्रिय पर पानी डालते समय नितम्ब या अन्य अंग पर पानी का स्पर्श न हो सके । स्टूल के ठीक सामने उसकी उंचाई से एक इंच ठंडे पानी से भरा हुआ बड़ा पात्र या चौड़े मुंह वाली बाल्टी रखनी चाहिए ।

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